Friday, July 4, 2008

बोझिल मन

पता नहीं क्यूँ, आज मन उतना पुलकित नहीं . लगता है कुछ अधूरा सा है और इस अधूरे से एहसास को दूर करने के लिए मैंने अपने लैपटॉप पे वोह सारी तसवीरें देखनी शुरू करी जो मैंने अपने ग्रदुअशन के प्रथम वर्ष से ली थीं. अच्छा भी लगा और अपने दोस्तों की याद भी बहुत आ रही है. अभी शायद मेरे पास सोचने के लिए काफी समय है इसलिए मैं इतना कुछ महसूस कर पा रही हूँ. पर शायद पढाई के शुरू होने के बाद इतना बुरा नहीं लगेगा!


बस, उन्हीं तस्वीरों को जब मैं देख रही थी तो मुझे ये तस्वीर दिखी , ये हमने अणि के मोटो ल-७ से लिया था जब हम तिरुपति जा रहे थे. शाम का समाया था. सूरज डूब रहा है और इस डूबते हुए सूरज ने मुझे आज फिर सशक्त बना दिया.


हे बोझिल मन, आज तूने मुझसे कहा, " ये ज़िन्दगी क्या है?";
मैंने कहा, "उस डूबते हुए सूरज को देख, मूर्ख, डूब कर भी कितना खुश लग रहा है;
उसकी लालिमा को देख, उसमें कहाँ वो बोझिलता है?"

मैंने सोचा आज डूब रहा है तो कल उसे उगाना भी है! इसी सोच को रखते हुए मैंने अपना मूड ठीक कर लिया और बस अपने काम में लग गयी. अपनी किताब पढने लगी और अब देखा तो कहानी में काफी दिलचस्पी भी लगने लगी.

8 comments:

DR.ANURAG said...

मै अक्सर अपने मरीजो से एक ही बात कहता हूँ.....अगर दिल से खुश रहोगे तो स्किन अपने आप ग्लो करेगी..मन में कांफिडेंस रखोगे तो जिंदगी आसान लगने लगेगी...कई दिन बोझिल होते है .पर खुशी की बात है ...अक्सर शाम ढले वे डूब जाते है एक नई सुबह तो आयेगी ही....

Power of Words said...

haan wahi to baat hai ismein

Power of Words said...
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Power of Words said...
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PD said...

मेरी बहना उदास क्यों है?? क्या भाई वाला रोग पाल ली है?? (मजाक कर रहा था..:))
पुरानी बातों को कभी भूलना नहीं चाहिये, मगर उसे याद करके उदास भी नहीं होना चाहिये.. समझी??
अब जल्दी से एडमिशन ले लो और लग जाओ पढाई में.. :)

Lovely kumari said...

tanaw insan ko tod kar rakh deta hai jitni jaldi ho sake isse liklen..bahut duniya dekhi hai isliye kah rahi hun :-)
aap kafi achchha likhti hain hindi me likha karen niymit,hum apni matri bhasa ke liye itna to kar hi sakte hain,ise ek aurodh samjhen anytha n len..

LOVELY
sanchika.blogspot.com

Power of Words said...

Haan dhanyavaad lovely ji

smilekapoor said...

...Saam ka duba suraj fir se ug aata hai...ek nayi subah lata hai... par hamari jindagi ki daud me subah hai to wo hai apne aziozon ki yaadon ke chalte... jis din ye yaaden gayin...samjho jingagi ki v sham aa gayi, ek aisi sham jiske baad fir savera ho... aisa koi tay v nahi...
"jingagi ke safar me gujar jate hain jo mukam, wo fir nahi aate...wo fir nahi aate..."