आज सुबह मैं यूँ ही अपने कमरे में बैठे अख़बार पढ़ रही थी और साथ में Big 92.7 FM पे , 'दिल से ' पिक्चर का गाना , ऐ अजनबी .. चल रहा था. बड़े सुकून से मैं ये गाना सुन रही थी. आज कल जमशेदपुर में दो FM का उद्घाटन हुआ है. एक है Big 92.7 FM और 93.5S FM. मेरे घर में सबका संगीत की तरफ काफी झुकाव है. पापा और मम्मी को काफी पसंद हैं गाने सुनना और मम्मी भी कभी कभी रसोईघर में काम करते करते- करते थोडा गुण -गुना लेती हैं. मैंने भी सोचा , यही मौका है, अभी FM भी आ गया है, क्यूँ ना एक रेडियो घर ले आउन .मेरे पास अपने स्कोलरशिप के पैसे थे और ये शायद मेरा बेस्ट गिफ्ट होगा मम्मी और पापा के लिए. तो मैं एक छोटा सा , स्पीकर वाला रेडियो ले आई और रसोईघर में लगा दिया.
मैंने अपनी माँ के लिए खासकर लिया था. मैं घर में अकेली लड़की हूँ और पढाई के लिए घर से बहार रहती हूँ. माँ भी मेरी तरह बातें करना काफी पसंद करती है और Tv भी नहीं देखती ज़्यादा क्यूंकि उनको ये रोज़ के सास - बहु वाली कहानियाँ अच्छी नहीं लगतीं . मैं जब तक साथ रहती हूँ तो दिन भर बातें होती हैं पर मेरे जाने के बाद पता नहीं बस अपने में ही रहती हैं. ऐसे ही 3 साल बीत गये. ऐसा मेरे घर में ही नहीं, हर उस माँ पर बीतता होगा जिनके बच्चे बाहार पढ़ते हैं या बाहार नौकरी करते हैं.
तो मैंने सोचा माँ का दिल बहलाने का सबसे अच्छा तारीका है, गाना सुनना. रसोईघर से फुरसत तो नहीं मिलत कि वे जाकर tv देखने बैठे, इसलिए FM सबसे अच्छी चीज़ सूझी मुझे. जब मैंने ये रसोईघर में रखा और दिन भर गाने चलाये तो घर में माहौल ही अलग था. मुझे तो गाने सुनना पसंद ही है और मैं तो लप्तोप में कभी भी चला ke सुन भी लेती हूँ पर मेरे मम्मी–पापा इतने खुश कभी नहीं दिखे. संगीत में इतनी ताकत होती है कि वो किसी का भी मॅन कर दे. हर भावना को व्यक्त करने के लिए एक गाना होता है.
वैसे ही आज सुबह गाना चल रहा था. ऐ अजनबी, जब ये ख़त्म हुआ तो माँ आई और बोली, “ अर्चू , तुम्हें बहुत बहुत थंक यू. कल तक तो मुझे नहीं पता नहीं चला पर आज सुबह से इतने अच्छे -अच्छे गाने बज रहे थे तो मुझे लगा कि कितने दिनों से मेरे कान इन गानों को सुनने के लिए तरस रहे थे. मुझे अब लग रहा है तुमने मेरे लिए कितनी कीमती चीज़ खरीदी है.” इतना उन्होने कहा और मुस्कुरा कर चली गयीं . मैंने पुछा ,“ अम्मा थंक यू क्यूँ बोल रही हो?” उन्होंने कहा, “ रख लो थंक यू, मेरा आर्शीवाद समझ कर.”
मैं और कुछ नहीं बोल सकी, बस मूक की तरह उसी शून्य में तान्कती रही जहाँ से माँ चली गयी और ………..मेरी आँखें भर आईं.
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Tuesday, June 3, 2008
Monday, May 26, 2008
प्रकृति के साथ
हमेशा से मेरा प्रकृति के साथ काफी लगाव रहा है. प्रकृति में जो भी परिवर्तन आता है उससे में काफी प्रभावित होती हो हूँ.
शाम का समय था , अभी जमशेदपुर में गर्मी का इतना प्रकोप नहीं पड़ा है. बारिश की फुहारों ने तापमान को सामान्य रखा है. आज भी वैसे ही , धीमे से ठंडी हवा चल रही है. में अपने बगीचे में कुर्सी लगा कर बैठ गयी.यूँ तो रोज़ मैं अपना बगीचा देखती हूँ पर आज न जाने कैसे, मेरी आँखों में एक चमक सी आ गयी. आसमान साफ था. बिलकुल नीला दिख रहा था. मेरे चारों और रंग ही रंग था . संसा लगा की में जिस चोटी सी दुनिया में बैठी हूँ वहाँ भी मेरी " रंग- भरी " दुनिया दिखती है. उसमें कहीं सूरज मुखी का वो पीला रंग, जीनिया की रंग बिरंगी क्यारियाँ, चंपा के फूल, जूही की मन मोहक खुशबू, पत्तों का हलचल, पक्षियों का कलरव सब कुछ मुझे मानो मंत्र मुग्ध कर गया हो.उसमें सूरज मुखी मुझसे नज़रें चुरा रही थी. ऐसा लग रहा था मानो एक नयी नवेली दुल्हन अभी-अभी थोडा शर्म त्याग कर घुल-मिल रही है. थोडी सी झिझक और थोडा सा खुलापन. मुझे तो बहुत मज़ा आ रहा था. इतने में , आम का एक पत्ता मेरे ऊपर आ गिरा. मेरी नज़र ऊपर पड़ी तो देखा की एक कौवा टहनी हिला रहा था. बड़ी मुश्किल से मैंने उसी जगह पर गौर किया और देखा की एक छोटा सा आम वहीं से लटक रहा है. "आह!! एक आम तो दिखा," मैं मॅन ही मॅन सोच कर मुस्कुरायी.. वरना इस बार तो हमारे पेड़ में एक भी आम नहीं हुआ. उस एक फल को देख कर मैं खुश हो गयी. मुझे आम जितना खाना पसंद नहीं उतना पेड़ से तोड़ना पसंद है.
घास पे चलते हुए एक कीडे को देख ही रही थी की अचानक मुझे अपनी दुनिया में वापस आना पड़ा.मेरे बगल वाले घर में एक गाना चल रहा था-
" यूँ ही चला-चल रही, यूँ ही चला-चल राही,
जीवन गाडी है समय पहिया ......."
क्या सटीक गाना था मेरे लिए. पता नहीं इस इस समय में यही गाना बजने का मतलब क्या हो सकता है? लगता है, ईश्वर की महिमा है. मुझे एहसास हुआ कि इस बगीचे के चक्कर में मैंने अपने पैंतालीस मिनट बर्बाद कर दिए. मुझे कुछ पढ़-लिखना भी था. प्रकृति का तो यही खेल है. उनकी ज़िन्दगी वैसे ही चलती रहेगी और मेरी भी चलती रहनी चाहिए.
पर जितनी भी देर मैं वहाँ थी, मैं एक दूसरी ही दुनिया में थी. एक सुकून सा मिला मुझे. प्रकृति से प्रेरित हो kar मैंने ये लिखा है. ऐसे तो बगीचे और फूलों कि बात जब आती है तो हरीवंश राय बच्च्चन जी कि कविता- ' जो बीत गयी वो बात गयी ', कि कुछ पंक्तियाँ याद आती है-
मधुबन के आँगन को देखो.........
...............................
पर देखो इन सूखे फूलों पर मधुबन कब शोक मनाता है?
जो बीत गयी वो बात गयी.
शाम का समय था , अभी जमशेदपुर में गर्मी का इतना प्रकोप नहीं पड़ा है. बारिश की फुहारों ने तापमान को सामान्य रखा है. आज भी वैसे ही , धीमे से ठंडी हवा चल रही है. में अपने बगीचे में कुर्सी लगा कर बैठ गयी.यूँ तो रोज़ मैं अपना बगीचा देखती हूँ पर आज न जाने कैसे, मेरी आँखों में एक चमक सी आ गयी. आसमान साफ था. बिलकुल नीला दिख रहा था. मेरे चारों और रंग ही रंग था . संसा लगा की में जिस चोटी सी दुनिया में बैठी हूँ वहाँ भी मेरी " रंग- भरी " दुनिया दिखती है. उसमें कहीं सूरज मुखी का वो पीला रंग, जीनिया की रंग बिरंगी क्यारियाँ, चंपा के फूल, जूही की मन मोहक खुशबू, पत्तों का हलचल, पक्षियों का कलरव सब कुछ मुझे मानो मंत्र मुग्ध कर गया हो.उसमें सूरज मुखी मुझसे नज़रें चुरा रही थी. ऐसा लग रहा था मानो एक नयी नवेली दुल्हन अभी-अभी थोडा शर्म त्याग कर घुल-मिल रही है. थोडी सी झिझक और थोडा सा खुलापन. मुझे तो बहुत मज़ा आ रहा था. इतने में , आम का एक पत्ता मेरे ऊपर आ गिरा. मेरी नज़र ऊपर पड़ी तो देखा की एक कौवा टहनी हिला रहा था. बड़ी मुश्किल से मैंने उसी जगह पर गौर किया और देखा की एक छोटा सा आम वहीं से लटक रहा है. "आह!! एक आम तो दिखा," मैं मॅन ही मॅन सोच कर मुस्कुरायी.. वरना इस बार तो हमारे पेड़ में एक भी आम नहीं हुआ. उस एक फल को देख कर मैं खुश हो गयी. मुझे आम जितना खाना पसंद नहीं उतना पेड़ से तोड़ना पसंद है.
घास पे चलते हुए एक कीडे को देख ही रही थी की अचानक मुझे अपनी दुनिया में वापस आना पड़ा.मेरे बगल वाले घर में एक गाना चल रहा था-
" यूँ ही चला-चल रही, यूँ ही चला-चल राही,
जीवन गाडी है समय पहिया ......."
क्या सटीक गाना था मेरे लिए. पता नहीं इस इस समय में यही गाना बजने का मतलब क्या हो सकता है? लगता है, ईश्वर की महिमा है. मुझे एहसास हुआ कि इस बगीचे के चक्कर में मैंने अपने पैंतालीस मिनट बर्बाद कर दिए. मुझे कुछ पढ़-लिखना भी था. प्रकृति का तो यही खेल है. उनकी ज़िन्दगी वैसे ही चलती रहेगी और मेरी भी चलती रहनी चाहिए.
पर जितनी भी देर मैं वहाँ थी, मैं एक दूसरी ही दुनिया में थी. एक सुकून सा मिला मुझे. प्रकृति से प्रेरित हो kar मैंने ये लिखा है. ऐसे तो बगीचे और फूलों कि बात जब आती है तो हरीवंश राय बच्च्चन जी कि कविता- ' जो बीत गयी वो बात गयी ', कि कुछ पंक्तियाँ याद आती है-
मधुबन के आँगन को देखो.........
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पर देखो इन सूखे फूलों पर मधुबन कब शोक मनाता है?
जो बीत गयी वो बात गयी.
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