बस, उन्हीं तस्वीरों को जब मैं देख रही थी तो मुझे ये तस्वीर दिखी , ये हमने अणि के मोटो ल-७ से लिया था जब हम तिरुपति जा रहे थे. शाम का समाया था. सूरज डूब रहा है और इस डूबते हुए सूरज ने मुझे आज फिर सशक्त बना दिया.
हे बोझिल मन, आज तूने मुझसे कहा, " ये ज़िन्दगी क्या है?";
मैंने कहा, "उस डूबते हुए सूरज को देख, मूर्ख, डूब कर भी कितना खुश लग रहा है;
उसकी लालिमा को देख, उसमें कहाँ वो बोझिलता है?"
मैंने सोचा आज डूब रहा है तो कल उसे उगाना भी है! इसी सोच को रखते हुए मैंने अपना मूड ठीक कर लिया और बस अपने काम में लग गयी. अपनी किताब पढने लगी और अब देखा तो कहानी में काफी दिलचस्पी भी लगने लगी.